गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

गढ़ मित्र परिषद्

हर तरफ थी जहाँ खुशिया उस देवभूमि को सबने छोड़ दिया 
उन अपनों की उम्मीदों को हमने आज बीरान सा बना दिया 
क्यों चले पहाड़ से क्या मिलती है हमें खुशिया शहर में 
न रहता है यहाँ कोई अपना फिर भी रहते हो उम्मीदों में 
भागते फिरे आसियाना को मिले एक छोटा महख़ाना
फैला घर सब का बिखर टूट गया तो फिर न पछताना 
धन दौलत बहुतों का होगा पागलो क्या काम आएगा 
बक्त है न करो तुम लालच सब कुछ यही रह जाएगा
चलो जन्म भूमि ओर एक नया पट्टी खाटली बनाना है 
जहाँ बहे विकास की नदियां वक्त है सबको बताना है 
हर छेत्र के नव युवक जागो एक नया अलख जगाओ 
हम भी छेत्र को बीरन न होने देंगे सब कोयह बताओ 
हमारे छेत्र की एकता थी ऒर सदा सदा बना रहेगा
गढ़मित्र परिषद्के तले बढे हम ध्य विकास रहेगा

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