शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

गढ़वाल के पहाड़ की बीरानी से क्या निकलते हैं किसी के आंसू

दोस्तों न मैं  पत्रकार हूँ ,न नेता हूँ ,एक  उत्तराखंडी पहाड़ी होने के नाते जो कुछ देखा ,सुना ,और महसूस किया या कर रहा हूँ  उसको ही बयां कर  रहा हूँ ,हो सकता है किसी पार्टी ,ब्यक्ति बिशेष को बुरा लगे गावो की हकीकत से मुह नहीं मोड़ सकते पर अगर हो सके तो गौर करने के बाद हमें  माफ़ करना
उत्तराखंड बने वर्षों हो गए हैं पहाड़ों की हालात वैसी की वैसी है कुछ सड़के बनी पर वह भी अभी कच्ची  ही हैं छोटी गाड़ियां जोखिम में डालकर सवारी ढो रही हैं ,पहले खेतों में काम होता था अब कुछ खेत सडकों की वजह से बंजर हो गई और कुछ लोगों की पलाइन के वजह से .हाँ एक काम जरूर हो गया है राजनीती करनी, कोई बीजेपी कोई कांग्रेस ,कोई बसपा के हो गए , आज   लोग खेती नहीं कर रहे हैं  जानबरों की कमी जिससे  गोबर से खाद मिलता था . आज गौशाले बंद पड़े हैं . जब से उत्तराखंड बना है पार्टियों ने बड़े-२ वादे  किये थे ,राजधानी गैरसैण बनाएंगे पर बना डाला देहरादून ,और जो नेता वहां गया वहीँ का हो गया  लोग भी  शहर की और जाने लगा .हर ५ साल में  पहाड़ी जगह के लोगों की याद आ जाती है .फिर वही बड़े-२ वादे.आस रहती है कुछ करेंगे पर हर वक्त धोखा , जनता  किसी को भी अपना लेती है चाहे उस नेता को गऊ का नाम भी पता न हो ,उस जगह का न हो  फिर भी विश्वास .पर विश्वास घात कर जाते हैं , देहरादून  शिकायत करने कोई जाय तो कहा जाता है इतने गाउँ के हस्ताक्षर करके  लाओ तक यह योजना आ सकती है .  जिन गाउँ में २००से ५०० ही आवादी हो ज्यादा कहाँ से  लाये, हॉस्पिटल  एक्सरे,खून जाँच की मशीन आदि ,या अन्य योजनाओं के लिए,  किसी बैंक को लाना हो तो कहा जाता  इतने  पेंशनर एरिया  में होने होने चाहिए.अब बोलो वहां सुविधा कैसे होगी,  इलाज के लिए बड़े शहरों  में जाना पड़ता है कितने तो रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं  . पहाड़ी  लोग. भावुक होते हैं शायद इसी का फ़ायदा  लेते हैं , चुनाव आने पर गाउँ में प्रलोभन जैसे पैसे, दारु बाँट कर ग्रुप बनवा कर सीट सुरक्षित हो जाती है  कोई नहीं सोचता है ४-१० गाउँ  के बीच एक  सुबिधा  वाला हॉस्पिटल  खोल दे ,उदाहरण .पौड़ी जिले के पट्टी खाटली मल्ली ,तल्ली गुजुडू ,,बीरोंखाल , आदि एरिया में एक ही एक्सरे मशीन  है वहां की जनता कैसे इलाज करे , कुछ झोला छाप  बंगाली डॉक्टर मार्किट में हैं पर उनकी आजतक जाँच नहीं ,जनता उनकी दवाई से ही काम चला रहे है , चाहे सही दे या मर जय ,नेता मांग क्यों उठाये,  सुबिधा कैसे  दे सकते हैं आदत जो पड़ी है . इसका मूल कारण  गैरसैण राजधानी न होना , अगर वहां होता तो जनता वहां  अवगत करा सकती थी जनता पर कोई  नेता  शायद वहां नहीं जाना चाहता क्योँ की   गाउँ के बीच उन्हें  ऐसो आराम की  जिंदगी न मिल सकती, नेता  जनता चुने पर अपने बीच में रहे जो आसपास के गाउँ का हो ,जिसने  अपनों का दर्द  सहा ,मदद कर सके किसी पार्टी का हो ,समझदारी जनता की  जरूरी है अगर इस बार भी वही हुआ तो जो कुछ बचे हैं गाउँ में उन्हें भी देर  नहीं लगेगी शहर की ओर जाने में , उत्तराखंड की जनता कब तक रोना रोएगी,।                                                            दानसिंह रावत।                                                                           



   उत्तराखण्ड हितेषी