मंगलवार, 18 जुलाई 2017

हमर खटली पर नजर न लग्या

कनु भलु लागंद लागंद असाड़ सोणा को महीना
हरा -हरा पुंगड़ा .कन फंक्यां छी रौली गदना
हत कुटिली मुंड पन्नी सरासर सरकिन्दी
मंडवा .झुंगरू. धान हुयान फटाफट जो बिरंदी
अखरोट , कू डालु हुयां फलों की बहार हुयां 
कंडली की पत्ती हुयां खिरबोजा कू पात हुयां
दिन हुयां रात हुयां मंडवा की रोटी संग खया
भलु लगालु - जरा अपरू मुलक घूम अयं
बादलों कू कड़कड़ाट .रोली गद्नियोँ सरसराहट
चखुलियों कू चकचाट मिंडकियोँ की टरटराहट
कनु भलु लागंद लागंद असाड़ सोणा को महीना 
हरा -हरा पुंगड़ा .कन फंक्यां छी रौली गदना 
इन भलु मौसम इन भलु पहाड़ चला अब घार
बीरान छी गौं उजिड़ गैना बरसातल सबि का घार 
कूड़ी चूणा छी .छनुड़ी बन्जा छी पुंगड़ीओं घास जमी  
घार रावा सुध साँस ल्यावा. माँ देवभूमि सभी थै बुलानी  
कनु भलु लागंद लागंद असाड़ सोणा को महीना 
हरा -हरा पुंगड़ा .कन फंक्यां छी रौली गदना 
जय पहाड़ जय उत्तराखंड।                                                                                   दानसिंह रावत                                                                                         ग्राम नऊ 

मेरे बेदर्दी लोगो जुलम न करो

 दुनिया बदली हम बदले पहाड़ जो है सुनसान 
इधर उधर भटकते कुछ प्रदेश रहना समझते शान 
फूलों की ,रानी पहाड़ों का राजा दुनिया का कहना
ठंडी हवाओं की बहिना नदियों का लहरा कर बहना
सारी उमर, हमें वही साथ रहना है सब का कहना है 
क्योँ फिरे हम नादान जब पहाड़ ही हमने जाना है 
जब पैसों की खातिर लालच से पहाड़ से हम हुए दूर 
तबसे सारे जीवन के हमने अपनों के सपने किये चूर
आँखों में नींद ना मन में चैन हमने उनका खोया 
जब पास हो उनके सोचो वह कितना होगा रोया 
एक हजारों में.उत्तराखंड है जब प्यारा अपना 
एक प्यारा सा उन्नतिशील बने पहाड अपना 
देखो हम सब उस मिटटी और इक डाली के फूल
मैं ना भूला, तुम चकाचौंद से गए अपने दिन भूल
जीवन के दुखों से यूँ सभी रोज झगड़ते लड़ते हैं 
ऐसे बच के सच से सभी गुज़रते भागते नहीं हैं
सुख की है चाह तो, दुःख भी सहना होता है
जहाँ गम हो वहां मुस्कराहट भी लाना होता है 
देखो जिधर सब सूना -सूना लग रहा है निहार रहा है 
हमसे हर पहाड़ नदी .खेत खलियान कह रहा है 
जाओ मै कब से तुम्हारी राह देख रहा हूँ 
मत छोड़ो इस भूमि को सादर तुम्हे बुला रहा हूँ 
जय उत्तराखंड जय पहाड़                                                                            रचना।                                                                                                       दान सिंह रावत