किस - किस को दास्ताँ सुनाऊँ,
कभी मैं बंजर था ,किस अभागे ने मुझे संवारा ।
क्यों मुझसे उम्मीद ,उसने पल-२ जगाई जगाई,
अपनों के कारण. उसने शायदु झूठे उम्मीद जगाई ।
अपना खून पसीना ,बहाकर, अपनों के लिए बनाया,
एक दिन मुझको .इस घर को मेरे संवार देंगे।
बच्चों की किलकरियो से घर भर देंगे,
मैं भी खुश था , मुझे सम्मान मिलेगा।
देव देवताओं का वास बनूँगा सब को बहुत आशिर्वाद दूंगा,
दिन, वर्षों जाते गए ,खुशिओं से आँगन भरते गए ।
धन दौलत की वरसात होती गई मैं भरता गया ।
अब उनके मन में शांति कहाँ उड़ने को आतुर हुए,
मुझ अभागे को सब छोड़के चले गए।
अब पड़ा मैं वीरान , मुझे देखते ही मुंह फेर लेते हैं,
मेरा क्या कसूर ,पर मैं अब भी आस पर हूँ ।
मुझे कोई तो संवारने आएगा . मेरे छाया से अपना सपना साकार करेगा ।
अगर नहीं आना मेरी छाया में तो क्या मेरा कसूर बता जायेगा ।
कभी मैं बंजर था ,किस अभागे ने मुझे संवारा ।
क्यों मुझसे उम्मीद ,उसने पल-२ जगाई जगाई,
अपनों के कारण. उसने शायदु झूठे उम्मीद जगाई ।
अपना खून पसीना ,बहाकर, अपनों के लिए बनाया,
एक दिन मुझको .इस घर को मेरे संवार देंगे।
बच्चों की किलकरियो से घर भर देंगे,
मैं भी खुश था , मुझे सम्मान मिलेगा।
देव देवताओं का वास बनूँगा सब को बहुत आशिर्वाद दूंगा,
दिन, वर्षों जाते गए ,खुशिओं से आँगन भरते गए ।
धन दौलत की वरसात होती गई मैं भरता गया ।
अब उनके मन में शांति कहाँ उड़ने को आतुर हुए,
मुझ अभागे को सब छोड़के चले गए।
अब पड़ा मैं वीरान , मुझे देखते ही मुंह फेर लेते हैं,
मेरा क्या कसूर ,पर मैं अब भी आस पर हूँ ।
मुझे कोई तो संवारने आएगा . मेरे छाया से अपना सपना साकार करेगा ।
अगर नहीं आना मेरी छाया में तो क्या मेरा कसूर बता जायेगा ।
दानसिंह रावत धौड़िया ग्राम नऊ खाटली