शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

वीरान घर की आवाज

किस - किस  को दास्ताँ सुनाऊँ,
कभी मैं बंजर था ,किस अभागे ने मुझे संवारा ।
क्यों मुझसे उम्मीद ,उसने पल-२ जगाई जगाई,
 अपनों के कारण.  उसने शायदु झूठे उम्मीद जगाई ।
अपना खून पसीना ,बहाकर, अपनों के लिए बनाया,
एक दिन मुझको .इस घर को मेरे संवार देंगे।
बच्चों की किलकरियो से घर भर देंगे,
मैं भी खुश था , मुझे सम्मान मिलेगा।
देव देवताओं का वास बनूँगा सब को  बहुत आशिर्वाद दूंगा,
 दिन, वर्षों जाते गए ,खुशिओं से आँगन भरते गए ।
धन दौलत की वरसात होती गई मैं भरता गया ।
 अब उनके  मन में शांति कहाँ उड़ने को आतुर हुए,
मुझ अभागे को सब छोड़के चले गए।
अब पड़ा मैं वीरान , मुझे देखते ही मुंह फेर लेते हैं,
मेरा क्या कसूर ,पर मैं अब भी आस पर हूँ ।
मुझे कोई तो संवारने आएगा .                                                मेरे छाया से अपना  सपना साकार करेगा ।
अगर   नहीं आना मेरी छाया में तो क्या मेरा कसूर बता जायेगा  ।
                                                                                 दानसिंह रावत धौड़िया                                                           ग्राम नऊ  खाटली