पौड़ी गढ़वाल के पट्टी खाटली में सेकड़ों गाँव आते है पर वहां सुबिधाओं की कमी है नेता या सरकारी ओफ्फिसरों का कम आना जाना होता है सरकारी फंड हो या अन्य कम ही पहुचता है ,फिर भी वहां पर लोगों की एकता रहते है नाज है अपने खाटली के लोगों पर .,वहां के छोटे -छोटे जंगले सान बढ़ाते हैं एक बड़ा जंगले है जो गुजुडू ढांडा के नाम से जाना जाता है जहा से ,कुमाओं सरहद लगता है ख्त्तली गढ़ नाम से नदी बहती है जो सरैन्खेत से बहकर आती है लाखोरा नाम से जानी जाती है दूसरी गुजुडो डांडा दीबा से बहती है उसे रसिया कहते है उनकी भी अलग -२ खुबिया हैं लाखोरा जंगलों का पेड़ मिटटी पत्थर बहा कर काला लाल पानी लता है पर उसका बहाव कम होता है ,पर रसिया साफ पानी लेकराता है ,उसका बहाव तेज होता है ,दोनों का मिलाप रसिया महादेव मंदिर के पास होता है जो आगे चलकर दुनाओ में जाते हैं जो सारे खाटली के नदियों से बनता है .जिसका बहाव ४-५ फुट में भी तेज बहाव होता है ,
हमारे खाटली में कुछ खंडहर ,पत्थर एसे हैं जो सायद पुराने बुजुर्गो को मालूम है य कुछ ओउरों, मैं कुछ जगहों के बारे में शेयर करता हूँ
हमारे जनता इंटर कॉलेज ललितपुर के पास एक पहाड़ है जो ग्राम मंगरों में आता है उस पहाड़ में एक सुरंग है जो अब बंद पड़ा है कहते है वह उपर से २ किलोमीटर निचे तक है अंग्रेजों ने वहां वास किया था य उनके दर से पुर्बज छूपते थे .हमने अपने आखों से उस सुरंग को देखा क्योँ की हम स्कूल से छुपने को जाते थे ४-५ फुट तक ,हम लोग जब प्रदेश से गाँव जाते तो पिकनिक वहां मानते थे .हमारे उत्तराखंड की सर्कार कुछ पता करती तो उन धारोधरों का पता चलता की क्या-२ वहां हैं ,जड़ी बूटीओं की खाने हैं जो हमारे पूर्वज इस्तेमाल करते थे
भाई लोगो कुछ पत्थर भी हैं जो की कोई भी यकीन नहीं करेगा ,पर वहां के निवासी थोडा कर सकते हैं क्यों की उनके पुर्ब्जों ने बताया होगा ,कहते है पांडवो के वक्त के पत्थर है पांडव चुपके से घर बना रहे थे ,पथरों को इकठा करते -२ रात खुल गई ओउर पत्थर वहीँ छोड़ गए ,जिनपर अभी भी उन्ग्लिओं के निशान है हमने एक पत्थर देखा जिस पर हाथ जेसे निशान है ,ओ ग्राम नाओं (रशिया महादेव )के उपर खेतों के बीच है ,ओउर भी कुछ पत्थर हैं दीबा तक जो देखने लायक हैं सब हकीकत है या नहीं पता लगाने से मालूम होगा ,
सभी को खाटली गढ़वाल के निवासिओं की ओउर से सुभ कामना ,
दान सिंह रावत
ग्राम नऊ खाटली गढ़वाल वासी