शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

बस राजधानी हो गैरसैण उत्तराखंड

बस राजधानी हो  गैरसैण उत्तराखंड 

चले हम गैरसैण प्यारे  पहाड़ी साथिओ
अब रुके न कदम तुम्हारे  मेरे  साथिओ
सांस चलती रहे  नब्ज चाहे रूकती रहे 
बढ़ते जाये हर दम रुक न पाए एक कदम
अब न पाले गैरसैण के दुश्मन एक भी भरम
सर पहाड़ का हम अब  झुकने दिंगे नहीं 
बिन गैरसैण राजधानी के बात करंगे नहीं

जिन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रुत रोज रोज आती नहीं
बैठे रहे लुटता देखते रहे बस सोचते रहे
एक डोर  बँधो गैरसैण के सिवा कुछ नहीं
आज देव भूमि रोज तुम्हे पुकार रहा है
बीरगति आंदोलनकारी करहा रहा है
किसके लिए हमने जान निछावर कर दी
बेमानोँ के आगे अपनों ने क्या सर झुका दी
बीर प्रतापसिंह, गोपीचंद, धर्मानंद, रामपाल
भगवाल सिंह  को तड़पाकर खटीमा में भुना
हर पहाड़ के घर मातम औरपहाड़ लगा सूना
आज भी जालिम दुस्ससी घूम रहे है
देखो आज भी पहाड़ को ललकार रहे है

लेना है हर कीमत पर अब गैरसैण 
आज पहाड़  बनी है बीरान साथियों

चले हम गैरसैण प्यारे  पहाड़ी साथिओ
अब रुके न कदम तुम्हारे  मेरे  साथिओ
राह कुर्बानियों की ना वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नये काफ़िले
फ़तह का जश्न इस जश्न के बाद है
जिन्दगी मौत से मिल रही है गले
बाँध लो अपने सर से कफ़न साथियों
अब तुम्हारे हवाले उत्तराखंड साथिओ
खेच दो लकीर राजधानी गैरसैण बनाएँगे
जान भी गई तो उसे हासिल करके रहेंगे
लूट न सके ये पहाड़ को यतन करो साथिओ
बक्त है कफ़न बांध लो अब मेरे साथिओ
चले हम गैरसैण प्यारे  पहाड़ी साथिओ
अब रुके न कदम तुम्हारे  मेरे  साथिओ

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