मंगलवार, 18 जुलाई 2017

beeran pahad

चल उड़ जा रे पंछी कि अब पहाड़ हुआ बेगाना
चल उड़ जा रे पंछी कि अब हर गौं हुए बीराना
ख़त्म हुए दिन उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था
आज यहाँ और कल हो वहाँ ये जोगी वाला फेरा था
सदा रहा है इस पहाड़ में जिसका पानी दाना 
अब बनते जाए सब अपनों के भी बेगाना 
चल उड़ जा रे पंछी 
तूने पहाड़ पत्थर चुन कर,तोड़कर गौं एक बसाई
बारिश में तेरी भीगी काया, धूप में गरमी खूब खाई 
ग़म ना कर जो तेरी मेहनत तेरे काम ना आई
अच्छा है कुछ ले जाने से देकर ही कुछ जाना


चल उड़ जा रे पंछी ...
भूल गए अब वो मस्त हवा जहाँ फिरते थे डाली\-डाली
जब पहाड़ ही काँटा बन गई, चाल बन गई सब कि मतवाली
कौन भला उनसे अब पूछे, हो ना जिसका अब कोई माली
तेरी क़िस्मत में लिखा है अपनों के होते जीते जी मर जाना
चल उड़ जा रे पंछी ...
रोते हैं वो खेत खलियान साथ तेरे जो खेले
जिनके साथ लगाये तूने अरमानों के मेले
किसको पता अब इस पहाड़ में कब हो तेरा आना
चल उड़ जा रे पंछी ...
रोते हैं वो खेत खलियान .जीव साथ तेरे जो खेले
जिनके साथ लगाये तूने अरमानों के मेले
भीगी आँखों से ही उनकी, आज दुआयें उनकी ले ले
देख लो जहाँ आज सुनसान है कभी लगते थे मेले
चल उड़ जा रे पंछी .............
किसको पता अब इस पहाड़ में कब हो तेरा आना
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याद आये कभी इस देवभूमि बिन संकोच आना
चल उड़ जा रे पंछी कि अब पहाड़ हुआ बेगाना
चल उड़ जा रे पंछी कि अब हर गौं हुए बीराना

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