यादे भी क्या होती है
जब कभी अपने यादों का पिटारा टटोलता हूँ
तो मुझे ओ प्यारे दोस्त बहुत याद आते हैं
ओ बचपन याद आता है ओ कहानियाँ याद आते हैं
जी गौं में कदम रहता हूँ हर घरों से ओ यादें याद आते हैं
घरों के ओ पौधे ढूंढ़ता हूँ जो कभी कुचल जाते थे
उन लोगों को ढूंढ़ता हूँ जो कभी डंडे लेकर पीछे भागते थे
उच्ची आवाज देकर घर में मेरी शिकायत करते थे
भूल से गए कुछ ।छोड़ गए आईशाना कुछ यादे ही रह गई
जब कभी गुजरों इन गलिओं से सुनशान या खंडर रह गई
कभी चले गौं कोई तो बच्चों की ख़ुशी का ठिकाना न होता था
आज समय ने करवट बदला अब बस केवल यादें ही रह गई
जब कभी अपने यादों का ।।।।।



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