सोमवार, 14 मई 2018

हम परदेशी नादान


हम परदेशी नादान
हम परदेशी कितने नादान नासमझ  इंसान होते है
facewbook`गाउं पहाड़ के निर्जीव जो हैं उनके इशारे न समझते हैं
पक्षी की चहकना छोड़ो जानवरो के इशारे न समझे हैं।
याद करो वह पल जब किसानो को पक्षी सुबह जगाते हैं।।
वही सुबह जब प्रदेश को निकले अपनों को हम रुलाते है।
गौर करो उन पेड पौधों की छुपी को जब तुम घर से निकलो।।
न लहराए न ओ सुबह की ताजगी लगे कभी आजमा लो।
थम जाती है हवा  नदी की धरा जैसे कोई भूचाल आया हो।।
रोक लेते हैं कभी कांटे भी कि न इस भूमि को न छोड़ जाओ।
हम परदेशी कितने नादान ना समझ इंसान होते है।।
गांव  पहाड़ के निर्जीव जो हैं उनके इशारे न समझते हैं।
इतने धनवान हैं हम कि अपनों से थोडा मुहब्बत दिखा जाते हैं।।
अपनापन कुछ ५०-१०० रूपये दे कर उनसे पिंड छुड़ा देते हैं।
इससे तो वही निर्जीव सही जो सदा साथ निभा जाते हैं।।



हम परदेशी कितने नादान ना समझ इंसान है.
हम ................                                                                            दानसिंह रावत 

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